Monday, July 22, 2013

खोरठा साहित्य में झारखंडी अस्मिता और संघर्ष की अभिव्यक्ति

  झारखंडी अस्मिता और संघर्ष की अभिव्यक्ति सभी झारखंडी भाषाओं के साहित्य में देखा जा सकता है। यहाँ के रचनाकारों में चाहे गीत हो, झुमइर हो या कि शिष्ट कहानी, या नाटक, हर माध्यम से झारखंड में व्याप्त शोषण और उपनिवेसवादी मानसिकता के विरूद्ध कलम चलाया और अपने रचना में झारखंडी अस्मिता को स्थापित करने का पूरजोर प्रयास किया है। खोरठा भाषा साहित्य में भी यह परंपरा पूरी गरीमा के साथ देखी जा सकती है। खोरठा झारखंड की सर्वाधिक प्रसारित क्षेत्र की संपर्क भाषा है जिस कारण झारखंड के संघर्ष पर रचनायें खोरठा में भरपूर हुई हैं। यहाँ कुछ वैसे पंक्तियों को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत कर रहा हूँ जिससे खोरठा साहित्य में झारखंडी अस्मिता और संघर्ष की अभिव्यक्ति सहज रूप से हुई है।
’’मानभूमेक माटी तरें ,
हीरा, मोती,माणिक फरे,
ताव पेटेक जालांय हाय,
मानभूमेक लोक मोरे ।

बंम्बई गुजरात ,पंजाब
आसाम,उड़िसा,मद्रास से
ऐला भूखाक दल
केउ गाड़ीं ,केउ पैदल
केउ पेट भरे ।
खाय खाय मानभूमेक अन
गाल लाल लाल तुम्बा ऐसन
साहेब ऐसन घरें एखन
राजनीतिक जोरें
आर सुधना बेचारा
ईंटा ढोय ढोय मोरे ।(दिव्यज्योति-1954)

 घनबाद के श्रीनिवास पानुरी जी ेकीरचना जो यहाँ के लोगों की दूर्दशा और बाहर से आये लोगों की चालबाजी को दर्शाता हेै, यह रचना अलग राज्य निर्माण की साहित्यिक सुगबुगाहट की ओर इसारा करती है। इसका प्रमाण इनकी एक दूसरी रचना ’चाभी काठी’(नाटक) में मुखर होकर सामने आया है। ज्ञातव्य है कि झारखंड अलग राज्य आंदोलन के नेता बिनोद बिहारी महतो श्रीनिवास पानुरी के लिए मंच की व्यवस्था किया करते थे क्यों कि जन मानस में साहित्य का प्रभाव ज्यादा गहराइ्र्र तक असर डाल सकती है बनिस्पत राजनैतिक भाषण बाजी से, और यह बात महतो जी खुब जानते थे। ’चाभी-काठी’ नाटक तो लगता है बिनोद बिहारी महतो के चरित्र को ही ध्यान में रख कर लिखी गई हो। एक अंश देखें-  ’चाभी काठी’ नाटक का हिरो शम्भु का भाषण जो पुरा-पुरी एक राजनैतिक भाषण जैसा ही लगता है। भाषण खुल कर अलग राज्य की धारणा स्पष्ट रूप से सामने आया है-

’’...हमनीक घर-दुवाइर जमीं वारी, नदी नाला, पहाड़ पर्वत, वन जंगल, हाट घाट वाट।  किन्तु कोन्हों टा हमनिक नाय। सभे टें लोकेक अधिकार आइझ हमनी बोका, हमनी दीन’हीन पतित। हमनीक धरती सोना उगले हे किन्तु मजाल कि जे एक टुना उठाइ ली। ओह! आइझ हमनी आपने घरें भिखारी-शरणार्थी।......

....आइझ दलबंदीक युग- आइझ जातीयताक युग। आइझ राष्ट्रप्रेम नाय देश भक्ति नाय। मानूषेक उपर प्यार आर आइझ सूधे स्वार्थ घर भरेक चेष्टा। आपन बाढ़ेक उपाय। कोई मोरे चाहे बाचे। हमनी खातिर के चेष्टा करतो। नोकरी-चाकरी खातिर के चेष्टा करता? दिल्लीं केउ नाय, पटनों हमनीक केउ नाय। जे हमनीक सुख-दुख के दुनियाक सुनवता। हमनीक हिस्सा खातिर लड़त? केकरा एते गरज परल हे। हाँ आइझ हमनी निरूपाय। हमनीक धरती हमनीयेक टीक दाय। किन्तु कान्दले कुछ नाय होतो- भागले प्राण नाय बांचतो। जीयेक कांटा- जहाँ जा संग जीतो- गड़ते रहतों हमनीये के उपाय करे हो। विशाल भारतेक मानचित्रें हमनीके एगो आपन स्थान बनवे होत।

हम जानी, हम मानी- हम खोजी जे हमर क्षेत्रे हिन्दुस्तानेक हर क्षेत्रेक लोक रहता- रोजी रोटी कमैता। ऐसन जोदी नाय होवे तो भारतेक- एक राश्ट्रेक कोन्हों माने नाय, किन्तु, सबके हमनीक भाई बैन के रहे हो- मालिक बैन के नाय। जखन हमनीक क्षेत्र तखन इ क्षेत्रेक चाभी-काठी हमनीक हाथें रहत ऊ सभेक हाथे नाय।..’

शिवनाथ प्रमाणिक संपादित खोरठा कविता संकलन ’रूसल पुटुस’(1985) में कई कवितायें ऐसी हैं जो झारखंडी जनमानस को झकझोरती है, और अलग राज्य के लिए उकसाती है, देखें-

’’ वन काटाइकुन-
कोलयरी, डेम, फेकटरी भेल
झकझकाइल बिना तेलेक बाती भेल
ताओ हमनीक आँइख काना
सारा दिन खटल परहूँ, पेटे नाञ दाना
आपने माटीञ हामे पर, पर भेला बलगर
एहे टा हमर मनेक गुमाइर!’’
( अकलु राम मंत्री, पूर्व मंत्री-बिहार सरकार,बोकारो)

’’  अमरिकाक रेड इडियन नियर
हियाँको सरकार
आतंकवादी बताइके,समूल गुचवतो, ओकर सिपाही, ओकरे संग मिल के
गोली से उड़वतो।
बांझी गाँव ,एकर जीयत मिसाल बनल
से ले-
मुरगाक बांग सुना
  भिनसरिये उठा
  सोसन कर विरोध आर
  झारखंडी एकता खातिर
  जनवादी भाव से संघर्श करे ले
  एक ठीन जुमा  आवा गदगदाइल!
ओ झारखंड बासी
  जागा, जागा, जागा!!!
  अब ना रहा पाटाइल। ’’( गजाधर महतो ’प्रभाकर’, भुरकुण्डा,हजारीबाग)

’’ परदेसिया अइला पेट पोसेले
मानुस बुइझके देलिये डाँड़ाइले
आपने पेट तऽ पोसबे करला
टेंग पसाइर देला रहेले
आर नाञ पारबो सहे ले।’’ ( मो0 ’सिराजउद्दीन’, बोकारो)


’’’  कते दिन आर सहबें
अपमान आर धुतकार!
कि तोंय देखते रहबें
आपन घार के लुटाइत आर ई तियाचार
  उठाइ ले तीर कमान, आर-
बइरीक ताकइत तौल
उठ, जाग झारखंडी, अब तो नजइर खोल। ’’’’ ( प्रो0 बी0 एन0 ओहदार, रागगढ़)

’’’पीट देलक आंधे-मुंधे, बनाय देलक बौना।
छीन लेलक सोनाक थारी, धराय देलक दोना ।।’’(प्रदीप कुमार ’दीपक’, भेण्डरा)


’’ छीन लेलें नोकरी-चाकरी, हाम भेलों बेकार।
तोञ हियां सुखें खाहें हाम हाइनिसार।
हाम नीमर बोका-बोना तोञ हुसियार।
हाम रेजा-कुलह कमियां तोंय ठीकादार।
तोञ हियां तारा-उपरी तोरी आना-गोना।
आँइख मलके तोर काहे, देइख हामर टोना। ’’( श्याम सुन्दर महतो’श्याम’, धनबाद)

एक तरफ झारखंड में बाहरी प्रभाव के खिलाफ चुनौति पूर्ण रचनायें होती रहीं वहीं दूसरी ओर खोरठा साहित्य में वैसे रचनाओं की संख्या कहीं अधिक है जो झारखंड की मिट्टी से प्रेम दर्शाता और झारखंडी सांस्कृतिक अस्मिता को प्रतिष्ठित करती  है।

’संग जोरी चल डहरें रे दादा, झारखंड सरोबरे प्रेमेक कमल खिले(प्रदीप कुमार’दीपक’),’मांदइर बाजे रे, बांसी बाजे रे, अखड़े गहदम झुमइर लागे रे ( सुकुमार), ’झुमइ छोटा नागपूर के नगरिया रे ना’ (शिवनंदन पाण्डेय’गरीब’) आदि की रचनायें झारखंडीपन को आत्मसात करती  हुई और झारखंडी मानस को झकझोरति नजर आती है तो शिवनाथ प्रमाणिक ’चल डहरें चल रे! डहर बनाइ चल रे!’ जैसी हुकार भरती गीत से पूरा झारखंड गुज उठता है

1991 में धनपत महतो ने विरसा मुण्डा पर काव्य ही लिख डाला’ ’धरतीक देवता बिरसा भगवान’

खोरठा साहित्य में झारखंडी अस्मिता और संघर्ष की अभिव्यक्ति झारखंड राज्य गठन के बाद भी जारी रही है और रचनाकार इसे अपने कविताओं, कहानीयों और गीतों में व्;यक्त कर रहे हैं।
कुछ झारखंड गठन के बाद की खोरठा रचनाओं पर एक दृष्टि डालें-

’’...झारखंडेक मुक्ति हे कहाँ,
  कहाँ हो तोर राइज ?
  सोसनेक सासन हे हियाँ,
  सपुनेक भेल राइज।...
  कते बलिदाने पइलें राइज
दोसरें करइ सासन आइज
कि हाँथ मइलकें डाँड़ाइल हें
जकर कुरसी वोकर राइज।’’
(मो0 ’सिराज’, लुआठी, अंक-15,दिसम्बर,2005)

यही कवि आगे लिखता है,
’’ दिलेक सपुन टूइट गेल,
 मनेक आस मन्हीं रहल
अपहरन हत्या आर भुखमरी
नातन राइजेक ई वरदान।

झारखंड राज्य अलग होने के बाद जो समस्या आई वह नक्सली की और रोजगार को लेकर यहाँ के युवा पिढ़ी की जब आकांक्षाएँ सामने आई तो उसने भी साहित्य को प्रभावित किया। इस दिशा में इम्तियार गदर की खोरठा उन्यास ’पारसनाथ’ का नाम लिया जा सकता है जो झारखंड निमार्ण के नौ बर्ष बाद की रचना है और पुरे नक्सली पृष्ठ भूमि पर लिखी गई है। प्रो0 चितरंजन महतो ’चित्रा’ की कहानी संग्रह ’छाहइर’ जो झारखंड होने के बाद प्रकाशित है, ’हाम जियब कइसे’ कहानी में , ’’ रघु कहे लागल- काजे कहिअउ आर काजे सुनाविअउ ई इलाकाक दुख,-दरद। ई एम0सी0सी आर पुलिस कर झगड़ा में हाम गरीब साब पिसाइ लागल हों। बाजार-शहर ले धुर बोन-झार झंखाड़ में सांति आर सुख खातिर बपौति घार दुरा छोड़ी के बसला, खेती-बारी, कांड़ कोरबा करी के जिये खोजला मगुर हियाँ ले हालाकाइन हेवे लागल हइ से तो हियांक रहवइये आब जाने लागल।’’

हिन्दी कथा साहित्य में स्थापित होने के बाद खोरठा कथा साहित्य में जबरदस्त उपस्थिति दर्ज करने वाले  प्रहलाद चन्द्र दास ने नक्सलि समस्या से जुझ रहे ग्रामिणों की यथार्त बर्णन करते हुये इसे ’कुच-कुच अंधरिया राइत’ कहा है जो इस कहानी का शिर्षक भी है।

जो कई बार अलग राज्य गठन के प्रति असंतोष व्यक्त करता है और कहीं कहीं तो एक और उलगुलान केलिये जनता को उकसाता है। खोरठा साहित्य में अमिट छाप छोड़ने वाले विश्वनाथ दसौंधि ’राज’ जी ने अपनी   कहानी ’धधकल मोढ़ी’ (खोरठा कहानी संग्रह ’माटीक पुथइल 2008से।)में कुछ इसी तरह के संकेत दिये हैं-

  ’’.................कुछ बछर बाद झारखण्ड राज्य बइन गेलइ। चाइरो बाँटो खुसीक चहल-पहल। जे-जे झारखन्डेक विरोधी हला, सभे मनत्री बइन गेला। राज भोग करे लागला। मन्तुक दामुदरेक धारिय एगो अेखनू उपेछित गाॅव हइ- जहाँ मंगल माँझीक फाॅसी दइ गाड़ल गेल हइ। उहाॅ ककरो नजइर नाॅय जा हइ। मंगल माँझी आइझ नाॅय हे, मन्तुक ओकर छोआ-पुता आइझ माटी काइट  आपन जीवन बचाइ राखे ठून मुनाइ रहल हथ। परास गाछेक  सुगा ई सब देइख रहल ही। मन्तुक वाह रे ओकर मनेक बिसवास। अेखनू ओकर मने बिसवास हइ, जे एक-न-एक दिन आजादीक लाड़ाइ जइसन फेइर गाँवे मानुस बहरइतो. . . सभेक हाथे हतइ धधकला मोढ़ी. . हाँ. जरूरे हतइ।’


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